आरडीयू में बैठक के दौरान बवाल, एजेंडा फाड़ने पर बढ़ा विवाद
जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के एकात्म भवन में बुलाई गई आपातकालीन कार्य परिषद की बैठक भारी गतिरोध और हंगामे की भेंट चढ़ गई। कुलपति प्रो. राजेश वर्मा की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में शुरू से लेकर अंत तक जबरदस्त तनाव का माहौल बना रहा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने बैठक के एजेंडे को लेकर इस कदर गोपनीयता बनाए रखी थी कि शामिल होने आए सदस्यों को इसकी भनक तक नहीं थी। जैसे ही कुलपति ने एजेंडा सबके सामने रखा, वैसे ही बैठक कक्ष का माहौल गरमा गया। विश्वविद्यालय के इतिहास में संभवतः यह पहला मौका था जब प्रशासनिक मतभेद इस कदर बढ़े कि अंत में एजेंडे की कॉपी ही फाड़ दी गई, जिसने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एजेंडे की गोपनीयता पर बवाल और हाईवोल्टेज ड्रामा
बैठक की शुरुआत होते ही एजेंडे को गुप्त रखने को लेकर सदस्यों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। किसी भी सदस्य को पहले से एजेंडे की कॉपी न मिलने के कारण अविश्वास का माहौल पैदा हो गया। जैसे ही प्रस्ताव पटल पर रखे गए, सदस्यों का गुस्सा फूट पड़ा और देखते ही देखते शांतिपूर्ण चर्चा विवाद में बदल गई। विवाद की स्थिति इस कदर बिगड़ी कि आपसी सहमति बनने के बजाय वहां तीखी बहस होने लगी, जिसके चलते अंततः पूरे घटनाक्रम का पटाक्षेप एजेंडे के दस्तावेज फाड़े जाने के साथ हुआ।
कर्मचारियों के नियमितीकरण पर प्रशासनिक मतभेद
बैठक में विवाद का सबसे मुख्य केंद्र 13 कर्मचारियों को नियमित करने का संवेदनशील मामला रहा। कुलपति इस विषय पर गठित समिति के पूर्व आदेशों में कुछ संशोधन चाहते थे, परंतु कार्य परिषद के सदस्यों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया। सदस्यों का स्पष्ट मत था कि यह पूरी तरह से आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था का मामला है और इस पर कुलपति तथा कुलसचिव को आपसी समन्वय से फैसला लेना चाहिए। इस मुद्दे पर कुलपति और कुलसचिव के बीच के मतभेद भी खुलकर सतह पर आ गए, जहाँ अधिकांश सदस्य कुलसचिव के रुख के समर्थन में खड़े दिखाई दिए।
परीक्षा परिणाम और टेंडर प्रक्रिया पर तकरार
विवाद का दूसरा बड़ा कारण परीक्षा परिणाम और अंकसूची तैयार करने वाली कंपनी के टेंडर का मामला बना। वर्ष 2025 के टेंडर में दिल्ली की एक नई कंपनी ने न्यूनतम दरें प्रस्तुत की थीं, लेकिन उसे अब तक कार्य आदेश नहीं दिया गया था। बैठक में जब पुरानी कंपनी से ही काम जारी रखने का प्रस्ताव रखा गया, तो सदस्यों ने इसका पुरजोर विरोध किया। सदस्यों का तर्क था कि दोनों कंपनियों की दरों में बड़ा अंतर है और पुरानी कंपनी को उच्च दरों पर काम देने से भविष्य में ऑडिट संबंधी गंभीर आपत्तियां आ सकती हैं।
सहमति न बनने पर हंगामेदार अंत
जब कर्मचारियों की बहाली और टेंडर प्रक्रिया जैसे दोनों ही संवेदनशील मुद्दों पर कार्य परिषद के सदस्यों और प्रबंधन के बीच सहमति की कोई गुंजाइश नहीं बची, तो बैठक कक्ष में हंगामा चरम पर पहुंच गया। नियमों और दरों के फेर में फंसी इस चर्चा में गतिरोध इतना अधिक बढ़ गया कि कोई बीच का रास्ता नहीं निकल सका। अंततः गतिरोध से क्षुब्ध होकर अध्यक्ष ने एजेंडे की प्रति वापस ली और उसे फाड़कर बैठक की समाप्ति की घोषणा कर दी, जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में आ गई है।

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