सरकारी कर्मचारियों के लिए घोषित नियमावली है खासकर अधिकारियों के लिए की पद स्थापना के दौरान वे एक ही स्थान पर 3 साल से ज्यादा नहीं रह सकेंगे। उनका तबादला निश्चित है लेकिन कुछ अधिकारी अपने रसूख, सत्ताधीश से नजदीकी अथवा चाटुकारिता के बल पर न केवल अपने पद पर अंगद के पैर की तरह जमे रहते हैं बल्कि रिटायरमेंट के बाद भी जहां के तहां रहते हैं। राज्य सरकार के संस्कृति विभाग में वर्षों तक जमे रहने के बाद रिटायर हुए और फिर इसी विभाग में कमान संभालने वाले श्रीराम तिवारी का नाम शुमार हैं ऐसे ही अफसरों की सूची में। संस्कृति संचालनालय एवं स्वराज संचालनालय में मनमर्जियां करने वाले श्रीराम तिवारी वर्तमान में महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ के सर्वेसर्वा होने के साथ ही मुख्यमंत्री मोहन यादव जिन्हें वह छोटा भाई कहते हैं के संस्कृति सलाहकार भी है। श्रीराम तिवारी के मार्गदर्शन में ही इस बार उज्जैन का विक्रम महोत्सव लंबे समय यानी गुड़ी पड़वा तक विशाल पैमाने पर मनाया जा रहा है। करोड़ों रुपए के बजट वाले इस आयोजन में सब कुछ इन्हीं राम जी की कृपा से हो रहा है। ऐसे आयोजनों के लिए हर शासकीय विभाग विभिन्न प्रचार प्रसार कार्य, क्रियान्वयन आदि कार्यों के  लिए जनसंपर्क संचालनालय अथवा माध्यम मध्य प्रदेश का सहारा लेते हैं। दोनों ही सरकारी एजेंसियों के माध्यम से रजिस्टर्ड संस्थाओं को काम दिया जाता हैं, ताकि शासकीय कार्य में पारदर्शिता बरती जा सके और कार्य के अनुसार योग्यता वाली संस्थाओं को कार्य मिले सके। लेकिन श्रीराम तिवारी पर चुकी सीएम मोहन जी का वरदहस्त है लिहाजा उनके लिए कोई नियम कायदा लागू नहीं होता। जैसे कि श्रीराम तिवारी की आदत है कि वह सारे काम सिर्फ अपने चहेतों को ही दे रहे हैं चाहे कोई डॉक्यूमेंट्री बनाना हो, वीडियो बनाना हो, फोटोग्राफी हो या फिर प्रिंटिंग या स्टॉल आदि से संबंधित कार्य ही क्यों न हो, सारे काम श्रीराम तिवारी भक्तों के खाते में जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि श्रीराम तिवारी जिस संस्थान के सचिव और सर्वेसर्वा है, वहां कार्य आवंटन के लिए क्या प्रक्रिया है, क्या नियम कायदे हैं इसकी जानकारी हासिल करने के लिए जब सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दिया गया तो उसका कोई वाजिब जवाब नहीं दिया गया बल्कि विभाग की वैधानिक जानकारी जो जनमानस को बिना बताए दे दी जानी चाहिए उस सामान्य जानकारी को भी छिपाने के भरसक प्रयास किए गए, और ये बात किसी से छुपी नहीं हैं कि जानकारी इन्हीं श्रीराम तिवारी के डर के कारण छुपाई जा रही हैं। क्योंकि अगर जानकारी सामने आ गई तो इनकी पोल खुल जाएगी और इनके आका बेनकाब हो जाएंगे। साफ जाहिर होता है कि संस्थान में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है, आर्थिक अनियमितताएं हो रही है। यू भी कह सकते हैं कि श्रीराम तिवारी "हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे" वाली कहावत को ही चरितार्थ करने में लगे हैं। आखिर श्रीराम तिवारी पर मोहन सरकार इतनी मेहरबान, इतनी कृपालु क्यों है क्या इसीलिए कि उनके नाम में श्रीराम जुड़ा हुआ है या फिर इसीलिए कि भ्रष्टाचार की मिठाई ऊपर तक बांटी जा रही है। सीएम मोहन यादव भी गजब का भाईचारा निभा रहे हैं, कई ऐसा ना हो कि उनका यह भाईचारा उनके गले की फांस बन जाए ?